राजस्थान के जैसलमेर में रविवार, 4 अक्टूबर 2026 की सुबह दो नर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को डेजर्ट नेशनल पार्क के सम इलाके में खुले घास के मैदान में छोड़ा गया। राजस्थान में इस पक्षी को गोडावण कहा जाता है और यह राज्य पक्षी है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने दोनों पक्षियों को छोड़ा। पर्यावरण मंत्रालय की ओर से पत्र सूचना कार्यालय की विज्ञप्ति के मुताबिक राजस्थान के वन और पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा और केंद्र व राज्य के वरिष्ठ अधिकारी भी वहां मौजूद थे।
गोडावण गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति है। अब तक इसे बचाने का काम ज्यादातर प्रजनन केंद्रों के भीतर चल रहा था, जहां अंडों से चूजे निकालकर उन्हें पाला जाता है। मंत्रालय ने इस रिहाई को उसी काम का अगला पड़ाव बताया है, यानी केंद्रों में तैयार हुई आबादी से पक्षियों को उनके प्राकृतिक ठिकाने में दोबारा बसाने की शुरुआत।
केंद्रों के आंकड़े इस काम का पैमाना बताते हैं। सम और रामदेवरा के दो केंद्रों में इस समय 97 गोडावण रखे गए हैं। इनमें 40 पक्षी जंगल में दिए गए अंडों से निकले, जबकि 57 का जन्म केंद्र के भीतर हुआ। 86 पक्षी आगे प्रजनन के लिए रखे गए हैं और 11 को जंगल में छोड़ने के लिए चुना गया था। रविवार को उन्हीं 11 में से दो छोड़े गए।
केंद्रों में चूजों की संख्या भी पिछले साल के मुकाबले बढ़ी है। मंत्रालय के अनुसार 2025 में केंद्रों के भीतर 24 जीवित चूजे निकले और 2026 में यह संख्या 29 रही। जिस प्रजाति की जंगली आबादी डेढ़ सौ के आसपास आंकी गई हो, उसके लिए एक साल में दो दर्जन से ज्यादा चूजे बड़ी बात हैं।
वैज्ञानिकों ने एक और तरीका आजमाया है, जिसे जंपस्टार्ट कहा गया है। इसमें केंद्र में दिए गए अंडे जंगल में मादा गोडावण के घोंसलों में रख दिए जाते हैं। मादाओं ने इन अंडों को अपना मानकर सेया और राजस्थान में छह तथा गुजरात में दो चूजे निकले। गुजरात का मामला खास है। मार्च 2026 की एक सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार कच्छ के घास के मैदानों में केवल तीन मादा गोडावण बची थीं और अंडे को सम से कच्छ के नलिया तक करीब 770 किलोमीटर सड़क से ले जाया गया था।
जंगल में गोडावण की संख्या पर सबसे ताजा आधिकारिक अनुमान भारतीय वन्यजीव संस्थान की 2024-25 की रिपोर्ट में है। अक्टूबर 2024 और अप्रैल 2025 में करीब 14,000 वर्ग किलोमीटर इलाके में सर्वे हुआ। इसमें थार क्षेत्र में लगभग 130 गोडावण होने का अनुमान लगाया गया, और इस अनुमान में 21 पक्षियों तक ऊपर-नीचे की गुंजाइश रखी गई है। 2017-18 में यह अनुमान 128 था।
यानी आबादी फिलहाल टिकी हुई है, पर बढ़ी नहीं है। उसी रिपोर्ट के अनुसार ये पक्षी सर्वे वाले इलाके के सिर्फ 16 प्रतिशत हिस्से में मिले। बिजली की लाइनें, खेतों की बाड़, सड़कें, पानी के स्रोत और सौर संयंत्र तेजी से फैले हैं, जिससे घास के मैदान टुकड़ों में बंट रहे हैं और पक्षियों की मौत का खतरा बढ़ा है। सर्वे में आवारा कुत्तों, नीलगाय और सूअरों की मौजूदगी भी बढ़ती मिली।
इसी खतरे को देखते हुए राजस्थान वन विभाग ने डेजर्ट नेशनल पार्क के भीतर करीब 200 वर्ग किलोमीटर घास के मैदानों को बाड़ से घेरा है। संस्थान के लंबे टेलीमेट्री अध्ययन में यही घेरे गोडावण के प्रमुख प्रजनन इलाके के रूप में सामने आए। मंत्रालय के मुताबिक संरक्षण के कदम सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके द्वारा बनाई गई विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर उठाए जा रहे हैं।
बस्टर्ड रिकवरी कार्यक्रम पर्यावरण मंत्रालय, राजस्थान वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान मिलकर चला रहे हैं। तकनीकी सहयोग इंटरनेशनल फंड फॉर हुबारा कंजर्वेशन से मिलता है और आर्थिक मदद राष्ट्रीय कैम्पा से मिलती है। कार्यक्रम में प्रजनन के अलावा घास के मैदानों की बहाली, खतरों को कम करना और स्थानीय समुदाय को जोड़ना भी शामिल है।
स्थानीय लोगों को साथ लेकर वन्यजीव बचाने की कोशिश पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी दिखती है। वाराणसी के पास ढकवा और कैथी में गंगा डॉल्फिन देखने के ठिकाने नाव पर्यटन के साथ संरक्षण का संदेश जोड़ रहे हैं। अक्टूबर से सर्दियों में आने वाले पक्षियों का मौसम भी शुरू होता है, और दिल्ली-एनसीआर के पाठक सुल्तानपुर नेशनल पार्क में पक्षी देखने से जुड़ी जानकारी पढ़ सकते हैं।
आगे क्या होगा, इस पर मंत्रालय ने इतना ही कहा है कि इन दो पक्षियों से मिली सीख के आधार पर अगली रिहाइयों के तरीके धीरे-धीरे सुधारे जाएंगे। रिहाई के लिए चुने गए बाकी नौ पक्षी कब छोड़े जाएंगे, इसकी कोई तारीख नहीं बताई गई है।
भूपेंद्र यादव ने एक्स पर लिखी पोस्ट में इस कदम का श्रेय वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और मैदानी कर्मचारियों की लगभग एक दशक की मेहनत को दिया। अब असली परीक्षा जंगल में होगी, जहां ये दोनों नर बिजली की लाइनों, आवारा कुत्तों और टुकड़ों में बंटते घास के मैदानों के बीच अपने दम पर रहेंगे।







