धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को है। दृक पंचांग के अनुसार वाराणसी में धनतेरस की लक्ष्मी कुबेर पूजा का मुहूर्त शाम 5:44 से 7:42 बजे तक और गुरुग्राम में शाम 6:03 से 7:59 बजे तक है। दोनों शहरों में त्योहार की तारीख एक है, लेकिन पूजा की समय सीमा अलग है। नीचे दिए गए सभी समय भारतीय मानक समय के अनुसार हैं।
घर की पूजा का समय तय करते हुए केवल त्रयोदशी शुरू होने का समय देखना पर्याप्त नहीं है। पंचांग में तिथि, प्रदोष काल, वृषभ काल और पूजा मुहूर्त अलग पंक्तियों में दिए जाते हैं। इनमें पूजा मुहूर्त वह निर्धारित अवधि है जिसे परिवार अपने शहर के लिए देख सकता है। पूरी त्रयोदशी को उसी विशेष पूजा अवधि के बराबर मान लेने से भ्रम पैदा होता है।
धनतेरस 2026 का वाराणसी और गुरुग्राम मुहूर्त
| शहर | लक्ष्मी कुबेर पूजा | प्रदोष काल | वृषभ काल |
|---|---|---|---|
| वाराणसी | शाम 5:44 से 7:42 | शाम 5:14 से 7:49 | शाम 5:44 से 7:42 |
| गुरुग्राम | शाम 6:03 से 7:59 | शाम 5:34 से रात 8:10 | शाम 6:03 से 7:59 |
ये समय 6 नवंबर के लिए हैं। इन्हें दृक पंचांग के वाराणसी धनतेरस पृष्ठ और गुरुग्राम धनतेरस पृष्ठ से लिया गया है। स्रोत गुरुग्राम को अंग्रेजी में गुड़गांव नाम से दिखाता है। पृष्ठ खोलने पर शहर और वर्ष दोनों देख लें, खासकर यदि पहले किसी अन्य स्थान का पंचांग इस्तेमाल किया हो।
तालिका का व्यावहारिक मतलब एक उदाहरण से समझिए। शाम 5:50 बजे वाराणसी की बताई गई पूजा अवधि शुरू हो चुकी होगी, लेकिन गुरुग्राम की अवधि शुरू नहीं हुई होगी। शाम 7:50 बजे गुरुग्राम की अवधि चल रही होगी, जबकि वाराणसी की समाप्त हो चुकी होगी। इसलिए किसी रिश्तेदार के भेजे समय के साथ शहर का नाम होना जरूरी है। यह अंतर एक ही समय क्षेत्र के भीतर भी मौजूद है।
त्रयोदशी तिथि 6 या 7 नवंबर को है?
दोनों शहरों के पृष्ठों में त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को सुबह 10:30 बजे शुरू होकर 7 नवंबर को सुबह 10:47 बजे समाप्त होती है। धनतेरस पूजा की तारीख फिर भी 6 नवंबर दी गई है। अगले दिन सुबह तक तिथि रहने का अर्थ यह नहीं कि पंचांग ने शाम की पूजा 7 नवंबर को रखी है। तारीख के प्रश्न और तिथि की अवधि के प्रश्न को अलग पढ़ना चाहिए।
पंचांग अपनी धनतेरस गणना में त्रयोदशी के दौरान प्रदोष काल और स्थिर लग्न के मेल को आधार बताता है। उसके अनुसार वृषभ लग्न स्थिर लग्न है। यही कारण है कि ऊपर की दोनों पंक्तियों में पूजा का समय वृषभ काल के साथ मिलता है, जबकि प्रदोष काल उससे कुछ पहले शुरू हो जाता है और कुछ बाद तक रहता है।
पूजा मुहूर्त और खरीदारी का समय कैसे अलग पढ़ें?
यह तालिका लक्ष्मी कुबेर पूजा के लिए है। इससे किसी दुकान के खुलने का समय, खरीदारी की अनिवार्यता या किसी वस्तु का आर्थिक लाभ तय नहीं होता। सुबह 10:30 बजे त्रयोदशी शुरू होने की सूचना को शाम की पूजा का आरंभ बताना भी गलत होगा। खरीदारी और पूजा के लिए अलग शीर्षक वाले समय देखने पर दोनों के उद्देश्य पहले पहचानें।
दृक पंचांग धनतेरस पूजा के लिए अपने प्रदोष और स्थिर लग्न वाले समय को प्राथमिकता देता है तथा चौघड़िया को इस पूजा का आधार बनाने की सलाह नहीं देता। यह उस पंचांग की धार्मिक पद्धति है। परिवार किसी अन्य परंपरा का पालन करता हो तो उसी परंपरा के जानकार से समय स्पष्ट कर सकता है। अलग पद्धतियों के आरंभ और समाप्ति समय जोड़कर नई अवधि बनाना उचित नहीं होगा।
लक्ष्मी कुबेर पूजा की तैयारी में क्या देखें?
दृक पंचांग की कुबेर पूजा विधि में ध्यान, आवाहन, पुष्प अर्पण और पूजा समर्पण का क्रम बताया गया है। इसमें चंदन, अक्षत, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य का उल्लेख है। ये उस धार्मिक विधि के अंग हैं, किसी लाभ या धन प्राप्ति की गारंटी नहीं। पूरी विधि अपनाने वाले परिवार सामग्री और क्रम पहले पढ़ सकते हैं।
उसी स्रोत में कुबेर की प्रतिमा उपलब्ध न होने पर तिजोरी या आभूषण रखने के बक्से को प्रतीक मानकर पूजा करने का विकल्प दिया गया है। इसलिए उस विधि को पढ़ते समय प्रतिमा के विकल्प वाली सूचना भी देखें। केवल सामग्री की छोटी सूची से पूरी पूजा विधि का अनुमान लगाने के बजाय मूल पृष्ठ पर दिया क्रम समझना अधिक उपयोगी होगा।
यदि वाराणसी और गुरुग्राम में रहने वाले परिजन एक समय पर अपनी पूजा रखना चाहते हैं, तो तालिका की दोनों अवधियों का साझा हिस्सा शाम 6:03 से 7:42 बजे तक है। यह ऊपर दिए समय का साधारण मिलान है, अलग से घोषित नया मुहूर्त नहीं। परिवार अपनी पूजा की अवधि और स्थानीय परंपरा के अनुसार योजना बनाए।
त्योहारों की अन्य तारीखों के लिए हमारे करवा चौथ के कैलेंडर और परंपराओं तथा छठ पूजा के चार दिनों से जुड़े लेख उपलब्ध हैं। बाजार जाने वाले पाठक काशी के सराफा बाजार की सुरक्षा व्यवस्था पर हमारी स्थानीय रिपोर्ट भी पढ़ सकते हैं।


