देश में काम पर जाने वाले लोगों का सबसे बड़ा सहारा बाइक और स्कूटर हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के पहले राष्ट्रीय घरेलू यात्रा सर्वेक्षण के मुताबिक काम पर आने-जाने वाले लोगों में 42.6 प्रतिशत दोपहिया वाहन से सफर करते हैं। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने 5 अक्टूबर 2026 को इस सर्वे के मुख्य नतीजे जारी किए।

यह सर्वे जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच हुआ। इसमें 14,274 गांवों और 10,377 शहरी ब्लॉकों के 4,92,023 परिवारों से जानकारी ली गई, जिनमें कुल 20,34,371 लोग शामिल थे। सर्वे में एक किलोमीटर से ज्यादा की दूरी को ही यात्रा माना गया, इससे छोटी दूरी के सफर दर्ज नहीं किए गए। मंत्रालय की विज्ञप्ति के अनुसार इसका एक मकसद रेल मंत्रालय की जरूरत के आंकड़े जुटाना भी था।

काम पर जाने के तरीके में गांव और शहर का फर्क साफ दिखता है। शहरों में 52.3 प्रतिशत कामकाजी लोग दोपहिया से जाते हैं, गांवों में यह आंकड़ा 37.1 प्रतिशत है। गांवों में 36.6 प्रतिशत लोग पैदल और 13.4 प्रतिशत साइकिल से काम पर पहुंचते हैं। पूरे देश में कार से काम पर जाने वालों का हिस्सा केवल 3 प्रतिशत है और शहरों में भी यह 5.7 प्रतिशत से ऊपर नहीं जाता।

इन आंकड़ों से समझ आता है कि दोपहिया वाहन की कीमत, पेट्रोल का खर्च और इलेक्ट्रिक स्कूटर पर मिलने वाली मदद करोड़ों परिवारों के महीने के बजट से सीधे जुड़ी है। जो लोग त्योहार पर नया स्कूटर लेने की सोच रहे हैं, वे इलेक्ट्रिक स्कूटर पर पीएम ई-ड्राइव सब्सिडी की हमारी गाइड देख सकते हैं, जिसमें इस समय मिलने वाली रकम का हिसाब दिया गया है।

सर्वे में पुरुषों और महिलाओं के बीच बड़ा अंतर भी सामने आया है। देश में 61.9 प्रतिशत पुरुष कामगार रोज एक किलोमीटर से ज्यादा का सफर करके काम पर जाते हैं, जबकि महिला कामगारों में यह हिस्सा 41.9 प्रतिशत है। खर्च में भी यही फर्क है। तय कार्यस्थल तक आने-जाने पर पुरुष औसतन 835 रुपये महीना खर्च करते हैं और महिलाएं 533 रुपये।

ज्यादातर लोगों का सफर आधे घंटे के भीतर निपट जाता है। तय कार्यस्थल तक पहुंचने में औसतन 25 मिनट लगते हैं, गांवों में 23 और शहरों में 27 मिनट। 83.4 प्रतिशत कामगार 30 मिनट से कम में दफ्तर या काम की जगह पहुंच जाते हैं, जबकि 13.7 प्रतिशत को 30 से 60 मिनट लगते हैं। सुबह की भीड़ का समय भी सर्वे में दर्ज है: 94.9 प्रतिशत कामगार सुबह 10 बजे से पहले घर से निकलते हैं और 56.5 प्रतिशत सुबह 8 से 10 बजे के बीच।

आने-जाने का खर्च शहर में लगभग दोगुना है। तय कार्यस्थल तक जाने वाला एक कामगार औसतन 785 रुपये महीना खर्च करता है। शहर में यह रकम 1,044 रुपये और गांव में 612 रुपये है। छात्रों के मामले में औसत खर्च 443 रुपये महीना है, शहरी छात्रों के लिए 617 रुपये और ग्रामीण छात्रों के लिए 361 रुपये।

स्कूल और कॉलेज जाने वाले बच्चों की तस्वीर अलग है। छह साल और उससे ज्यादा उम्र के 66.4 प्रतिशत छात्र रोज एक किलोमीटर से ज्यादा चलकर पढ़ने जाते हैं। इनमें 37 प्रतिशत पैदल जाते हैं, 29.5 प्रतिशत बस से और 15.8 प्रतिशत साइकिल से। 6 से 14 साल के बच्चों में पैदल जाने वालों का हिस्सा 47.3 प्रतिशत है। शहरों में 14.4 प्रतिशत छात्र ऑटो रिक्शा से और 11.5 प्रतिशत दोपहिया से जाते हैं।

छात्रों का औसत सफर 23 मिनट का है और 87.6 प्रतिशत छात्र आधे घंटे के भीतर स्कूल या कॉलेज पहुंच जाते हैं। स्कूल के लिए निकलने का सबसे व्यस्त समय सुबह 8 से 9 बजे का है, जब 35.7 प्रतिशत छात्र घर से निकलते हैं। इसके बाद 7 से 8 बजे के बीच 26.6 प्रतिशत और 9 से 10 बजे के बीच 19.7 प्रतिशत छात्र निकलते हैं।

मेट्रो, लोकल ट्रेन, मोनोरेल और ट्राम जैसे साधनों से देश के शहरों में केवल 5 प्रतिशत कामगार सफर करते हैं। कुछ राज्यों में यह हिस्सा काफी ऊंचा है: महाराष्ट्र में 20.7 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 16.5 प्रतिशत और दिल्ली में 14.4 प्रतिशत। राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में काम पर जाने का औसत समय 20 से 23 मिनट के आसपास है, जबकि दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में यह ज्यादा है।

घर से 24 घंटे से ज्यादा बाहर रहने वाली लंबी यात्राओं में बस सबसे आगे है। ऐसी 55.8 प्रतिशत यात्राएं बस से और 17.7 प्रतिशत ट्रेन से होती हैं, जबकि कार का हिस्सा 15.1 प्रतिशत और दोपहिया का 8.8 प्रतिशत है। शहरी परिवारों में 22.7 प्रतिशत और ग्रामीण परिवारों में 14 प्रतिशत लोग ऐसी यात्रा के लिए ट्रेन चुनते हैं। 50 किलोमीटर से कम दूरी वाले सफर इस श्रेणी में नहीं गिने गए, भले ही व्यक्ति 24 घंटे से ज्यादा बाहर रहा हो।

इन लंबी यात्राओं की वजह भी दिलचस्प है। 70.2 प्रतिशत यात्राएं रिश्तेदारों से मिलने, सामाजिक कामों और धार्मिक कारणों से होती हैं। घूमने, खेल और मनोरंजन के लिए 7.4 प्रतिशत और अपनी देखभाल या इलाज जैसे कारणों से 6.5 प्रतिशत यात्राएं होती हैं। दिवाली 8 नवंबर को है और उसके बाद छठ आएगा, यानी लंबी पारिवारिक और धार्मिक यात्राओं का मौसम शुरू हो रहा है। त्योहारों के लिए चल रही वाराणसी होकर जाने वाली पूजा स्पेशल ट्रेनों की जानकारी हमारी पिछली रिपोर्ट में है।

मंत्रालय का कहना है कि ये आंकड़े सार्वजनिक परिवहन की कमियां पहचानने, रूट तय करने, बसों और ट्रेनों की फ्रीक्वेंसी सुधारने और क्षेत्रीय परिवहन योजना बनाने में काम आएंगे। सर्वे की पूरी तालिकाएं मंत्रालय की फैक्टशीट में दी गई हैं। देश में इस तरह का यह पहला सर्वे है, इसलिए आगे के सर्वे से ही पता चलेगा कि लोगों के सफर का तरीका किस ओर बदल रहा है।