राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने बीज कंपनियों से मिले लाभ-साझेदारी योगदान में से 2.02 करोड़ रुपये राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को बांटे हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 10 अक्टूबर को इसकी जानकारी दी। उत्तर प्रदेश का हिस्सा 9,80,038 रुपये है। कुल रकम 27 राज्यों के जैव विविधता बोर्ड और तीन केंद्रशासित प्रदेशों की जैव विविधता परिषदों को दी गई है।
यह पैसा जैविक संसाधनों के इस्तेमाल से मिलने वाले लाभ में स्थानीय संरक्षण व्यवस्था और समुदायों की हिस्सेदारी के लिए है। इसे एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग, यानी एबीएस, कहा जाता है। मंत्रालय की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, इस वितरण के बाद प्राधिकरण का कुल एबीएस वितरण 202 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
उत्तर प्रदेश समेत किस राज्य को कितना मिला
इस किस्त में सबसे अधिक 23,81,072 रुपये मध्य प्रदेश को मिले हैं। पश्चिम बंगाल का हिस्सा 23,32,913 रुपये और ओडिशा का 19,75,559 रुपये है। बिहार को 17,28,852 रुपये तथा गुजरात को 13,29,870 रुपये दिए गए हैं। इन रकमों का संबंध संबंधित जैविक संसाधनों के खेती वाले क्षेत्र से है, केवल राज्य की कुल आबादी से नहीं।
छत्तीसगढ़ को 11,37,521 रुपये मिले हैं। उत्तर प्रदेश के बाद आंध्र प्रदेश का हिस्सा 9,34,864 रुपये, कर्नाटक का 7,87,392 रुपये और महाराष्ट्र का 7,16,971 रुपये है। मंत्रालय ने सबसे अधिक हिस्सा पाने वाले इन दस राज्यों की राशि करीब 1.43 करोड़ रुपये बताई है। बाकी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को मिलाकर 58,94,948 रुपये मिले हैं।
उत्तर प्रदेश के लिए घोषित रकम राज्य जैव विविधता बोर्ड के हिस्से की है। इसे प्रदेश के हर किसान के खाते में सीधे पहुंचने वाली सहायता समझना सही नहीं होगा। राष्ट्रीय विवरण में जिलावार आवंटन या किसी गांव की परियोजना का बजट नहीं दिया गया है। इसलिए वाराणसी सहित किसी जिले के लिए अलग रकम अभी इस घोषणा से तय नहीं की जा सकती।
कंपनियों के योगदान का बंटवारा कैसे हुआ
विज्ञप्ति में जिन कृषि जैविक संसाधनों का उल्लेख है, उनमें धान, बैंगन, फूलगोभी, खीरा, तीखी मिर्च, लौकी, करेला, टमाटर और भिंडी शामिल हैं। योगदान इन फसलों की कई किस्मों और संकर किस्मों के इस्तेमाल से जुड़ा है। इससे स्पष्ट होता है कि लाभ-साझेदारी का यह हिस्सा बीज क्षेत्र और खेती की विविधता से संबंधित है।
योगदान देने वाली सात कंपनियों में ईस्ट वेस्ट सीड्स इंडिया, सिनजेंटा इंडिया, देवजेन सीड्स एंड क्रॉप टेक्नोलॉजी, लिमाग्रेन इंडिया, बायर साइंस एंड इनोवेशन, ननहेम्स इंडिया और एंजा जाडेन इंडिया शामिल हैं।
जहां जैविक संसाधन बाजार या व्यापारियों के जरिए खरीदे गए थे और व्यक्तिगत लाभार्थियों की पहचान नहीं हो सकी, वहां विशेष वितरण पद्धति अपनाई गई। इसे विशेषज्ञ समिति ने सुझाया था और प्राधिकरण ने मंजूरी दी थी। संबंधित फसलों के खेती वाले क्षेत्र के आधार पर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश का हिस्सा तय किया गया। इसके लिए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के प्रकाशित कृषि आंकड़े इस्तेमाल हुए।
स्थानीय संरक्षण में रकम का उपयोग
मंत्रालय के मुताबिक, बोर्ड और परिषदों के जरिए दिए गए ऐसे फंड जैव विविधता प्रबंधन समितियों को मजबूत करने और जन जैव विविधता रजिस्टर अद्यतन करने में सहायक हैं। कामों में पारंपरिक फसल किस्मों तथा औषधीय पौधों का संरक्षण, प्राकृतिक आवासों की बहाली और जैविक संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन शामिल हो सकता है। इनके जरिए किसानों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने की बात कही गई है।
मंत्रालय ने यह भी कहा है कि एबीएस से समर्थित गतिविधियां पीएम-जनमन, प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन और प्रधानमंत्री वन धन योजना जैसे कार्यक्रमों के साथ मिलकर काम कर सकती हैं। यह संभावित तालमेल है। विज्ञप्ति इन योजनाओं के लिए इस किस्त से अलग-अलग रकम मंजूर होने की घोषणा नहीं करती। स्थानीय स्तर पर खर्च का आकलन संबंधित बोर्ड के काम और अभिलेख से होगा।
इससे दो दिन पहले, 8 अक्टूबर के अलग सरकारी विवरण में अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान प्राधिकरण को 9.68 करोड़ रुपये मिलने की जानकारी थी। वह प्राप्त योगदान का आंकड़ा था। अब घोषित 2.02 करोड़ रुपये राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को किए गए वितरण का आंकड़ा है। दोनों को जोड़कर नई सहायता का कुल बताना उचित नहीं होगा।
यह व्यवस्था जैव विविधता अधिनियम, 2002 और राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति एवं कार्ययोजना 2024 से 2030 के लक्ष्यों से जुड़ी है। संरक्षण के दूसरे पहलुओं पर Dalimss News की जैसलमेर में गोडावण छोड़े जाने की रिपोर्ट और ग्रामीण कामों पर 375 अनुमन्य कामों का विवरण भी पढ़ सकते हैं। नई किस्त का आगे का महत्व इस बात में होगा कि राज्य संस्थाएं उसे किन संरक्षण कार्यों तक पहुंचाती हैं।








