देश में राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत सितंबर 2026 तक 40 सुपरकंप्यूटर लग चुके हैं और इनकी कुल क्षमता 68 पेटाफ्लॉप है। यह जानकारी पत्र सूचना कार्यालय ने 4 अक्टूबर को जारी एक पृष्ठभूमि नोट में दी है। मिशन का लक्ष्य कुल 50 सुपरकंप्यूटर लगाने और उनकी मिली-जुली क्षमता 123 पेटाफ्लॉप से ऊपर ले जाने का है। यानी अभी 10 मशीनें और लगनी बाकी हैं।
इस मिशन की पहली मशीन वाराणसी में लगी थी। IIT (BHU) का परम शिवाय मिशन के तहत लगाया गया पहला सुपरकंप्यूटर है, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 फरवरी 2019 को किया था। संस्थान के सुपरकंप्यूटिंग सेंटर के मुताबिक श्रृंखला में पहला होने और बाबा विश्वनाथ की नगरी में होने के कारण इसका नाम परम शिवाय रखा गया।
मिशन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार परम शिवाय की अधिकतम सैद्धांतिक क्षमता 837 टेराफ्लॉप है और यह 32.5 करोड़ रुपये में बना। इसमें 192 सामान्य कंप्यूट नोड, 22 जीपीयू वाले 11 नोड और कुल 54.3 टेराबाइट मेमोरी है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की सूची में पूर्वी भारत से IIT पटना का परम रुद्र भी है, जो 2025 में 838 टेराफ्लॉप क्षमता के साथ लगा।
सुपरकंप्यूटर की ताकत फ्लॉप्स में नापी जाती है, यानी एक सेकंड में कितनी गणनाएं। एक टेराफ्लॉप का मतलब है एक सेकंड में एक लाख करोड़ गणनाएं। एक पेटाफ्लॉप इसका हजार गुना है। आम कंप्यूटर एक सवाल पर एक के बाद एक काम करता है, जबकि सुपरकंप्यूटर में हजारों प्रोसेसर एक साथ एक ही बड़े सवाल के हिस्सों पर काम करते हैं। इसी को पैरेलल प्रोसेसिंग कहा जाता है।
दुनिया से तुलना करें तो फासला बड़ा दिखता है। नोट के मुताबिक 2026 में दुनिया का सबसे तेज सुपरकंप्यूटर करीब 2.19 एक्साफ्लॉप यानी 2,190 पेटाफ्लॉप की रफ्तार पर है। इस हिसाब से भारत के मिशन की सभी 40 मशीनें मिलाकर भी उस एक मशीन की क्षमता का करीब तीन प्रतिशत बैठती हैं। सरकारी नोट में मिशन का जोर रफ्तार की होड़ से ज्यादा देश में बनी मशीनों और उनके इस्तेमाल पर दिखता है।
40 मशीनों में 13 ऐसी हैं जिनकी क्षमता एक पेटाफ्लॉप से ज्यादा है। 12 मशीनें 500 टेराफ्लॉप से एक पेटाफ्लॉप के बीच हैं और बाकी 15 की क्षमता 500 टेराफ्लॉप से कम है। सरकार के अनुसार ये सभी देश में बनाई और चालू की गईं।
देश में बने सुपरकंप्यूटरों की शुरुआत 1991 में सी-डैक के परम 8000 से हुई थी, जिसकी रफ्तार एक गीगाफ्लॉप थी। बाद में परम युवा जैसी मशीनें 54 टेराफ्लॉप तक पहुंचीं। राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन अप्रैल 2015 में करीब 4,500 करोड़ रुपये के खर्च के साथ शुरू हुआ। इसे विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग और इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय मिलकर चलाते हैं, जबकि अमल की जिम्मेदारी सी-डैक पुणे और भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु की है।
मिशन का सबसे बड़ा दावा स्वदेशी पुर्जों को लेकर है। सी-डैक ने रुद्र सीरीज के सर्वर खुद डिजाइन किए और उनकी तकनीक भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण कंपनियों को दी। सितंबर 2026 तक परम रुद्र सुपरकंप्यूटरों में 6,000 रुद्र सर्वर लग चुके थे और 1,500 और बन रहे हैं। मशीनों को आपस में जोड़ने वाला 100 और 200 गीगाबिट प्रति सेकंड का नेटवर्क, ठंडा रखने की तकनीक और सिस्टम सॉफ्टवेयर भी देश में तैयार हुए हैं।
आम आदमी के लिए इन मशीनों का फायदा सीधे नहीं दिखता, पर कई सरकारी मॉडल इन्हीं पर चलते हैं। महानदी बेसिन में बाढ़ की चेतावनी दो दिन पहले तक देने वाला मॉडल इन्हीं पर चलता है। सिक्किम हिमालय में जंगल की आग कैसे फैलेगी, इसका मॉडल भी परखा गया है। कोविड के दौरान पहले से मौजूद दवाओं की जांच में भी इनका इस्तेमाल हुआ। भारत मौसम विज्ञान विभाग, केंद्रीय जल आयोग, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और आयुष मंत्रालय इन ऐप्लिकेशन का उपयोग करते हैं।
उपयोग के आंकड़े भी नोट में हैं। सितंबर 2026 तक 400 से ज्यादा संस्थानों के 16,000 से अधिक शोधकर्ता इन मशीनों पर काम कर चुके थे, जिनमें 2,900 से ज्यादा पीएचडी छात्र हैं। इन पर डेढ़ करोड़ से ज्यादा कंप्यूट जॉब चल चुके हैं और 1,990 से अधिक शोध पत्र निकले हैं।
छात्रों के लिए सबसे काम की जानकारी प्रशिक्षण से जुड़ी है। इंजीनियरिंग कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए परम शावक नाम का छोटा, डिब्बे जैसा सुपरकंप्यूटर बनाया गया है। NPTEL के तहत स्वयं प्लेटफॉर्म पर हाई परफॉर्मेंस साइंटिफिक कंप्यूटिंग का कोर्स है, और स्वयं के जुलाई 2026 सेमेस्टर की परीक्षाएं 8 से 12 दिसंबर को होनी हैं। एचपीसी शिक्षा पोर्टल पर रिकॉर्ड किए गए लेक्चर मिलते हैं और हर साल एडुएचपीसी कार्यशाला होती है।
शिक्षकों के लिए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम चलते हैं, जिनमें कंप्यूटर साइंस से बाहर के विषयों के शिक्षक भी शामिल किए जाते हैं। हैकथॉन और बूटकैंप में छात्र एआई और जेनरेटिव एआई पर हाथ आजमा सकते हैं। ये केंद्र राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क से जुड़े हैं, इसलिए दूर बैठे संस्थान भी इन मशीनों का इस्तेमाल कर पाते हैं।
उन्नत तकनीक में सरकार का एक और काम क्वांटम संचार में दिख रहा है, जिसके बारे में हमने देश के पहले 5.56 किलोमीटर फ्री स्पेस क्वांटम लिंक की खबर में बताया था। सुपरकंप्यूटिंग पर अगली बड़ी चर्चा 27 से 29 अक्टूबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में होने वाले ईएसटीआईसी 2026 सम्मेलन में होगी, जिसे वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद आयोजित कर रही है।
आगे का रास्ता नोट में साफ लिखा है। बाकी 10 मशीनें लगाकर क्षमता 68 से 123 पेटाफ्लॉप के पार ले जानी है। जोर कम बिजली खाने वाली, भरोसेमंद मशीनों और एआई के साथ सुपरकंप्यूटिंग को जोड़ने पर रहेगा। ये 10 मशीनें कहां और कब लगेंगी, इसकी सूची नोट में नहीं दी गई है।


