चंडीगढ़ की सुखना आर्द्रभूमि और उत्तर प्रदेश की सौज झील को रामसर सूची में शामिल किए जाने के बाद भारत में अंतरराष्ट्रीय महत्व की ऐसी आर्द्रभूमियों की संख्या 103 हो गई है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 15 अक्टूबर 2026 को इसकी घोषणा की। उन्होंने दोनों जगह पर्यटकों को आने का न्योता भी दिया। मंत्रालय की विज्ञप्ति में नई प्रवेश व्यवस्था, टिकट दर या संरक्षण के लिए अलग बजट घोषित नहीं किया गया है। इसलिए यात्रा की योजना और संरक्षण के कामों को इस घोषणा से अलग समझना होगा।
घोषणा की तारीख और रामसर अभिलेख की तारीख एक नहीं हैं। सुखना की प्रविष्टि में रामसर दर्जे की तारीख 16 मार्च 2026 है। इसका क्षेत्रफल 199.5 हेक्टेयर और स्थल क्रमांक 2602 दर्ज है। सौज झील के लिए रामसर दर्जे की तारीख 18 जून 2026, क्षेत्रफल 40.8 हेक्टेयर और क्रमांक 2603 है। दोनों प्रविष्टियों के आखिरी प्रकाशन की तारीख 15 अक्टूबर है। इन रिकॉर्डों को पढ़ते समय अक्टूबर की सार्वजनिक घोषणा को मार्च या जून में मिले दर्जे की तारीख का विकल्प मानना गलत होगा।
सौज और सुखना में पक्षियों के अलग ठिकाने
सौज झील का आधिकारिक विवरण इसे खेतों से घिरी उथली झील बताता है, जो गंगा के बाढ़ मैदान में स्थित है और समान पक्षी अभयारण्य के करीब है। यह आसपास की आर्द्रभूमियों के बड़े तंत्र का हिस्सा है। कमल और कांस जैसी वनस्पतियां जीवों को भोजन, आश्रय और प्रजनन की जगह देती हैं। रिकॉर्ड के मुताबिक यहां नियमित रूप से 30,000 से अधिक जलपक्षी आते हैं। दर्ज प्रजातियों में सारस और ग्रेटर स्पॉटेड ईगल शामिल हैं। यह संख्या किसी एक दिन की ताजा गणना नहीं, स्थल के आधिकारिक विवरण में दिया गया नियमित पक्षी जमाव का आंकड़ा है।
सुखना का रिकॉर्ड एक अलग तरह के ठिकाने की तस्वीर देता है। चंडीगढ़ के किनारे और बाहरी हिमालय की तलहटी में स्थित यह जलाशय आसपास के क्षेत्र से आने वाले पानी और गाद के प्रवाह को नियंत्रित करने में भूमिका निभाता है। यहां जलस्तर मौसम के साथ बदलता है। मध्य एशियाई प्रवास मार्ग से आने वाले पक्षियों के लिए यह भोजन, विश्राम और सर्दियां बिताने का ठिकाना है। कॉमन पोचार्ड और पलास फिश ईगल के साथ ब्लैक पॉन्ड टर्टल की मौजूदगी भी दर्ज है।
सुखना के सामने गाद जमा होने और आक्रामक प्रजातियों को नियंत्रित करने की चुनौतियां हैं। उसके रिकॉर्ड में प्रबंधन योजना मौजूद होने और उसमें मिट्टी तथा नमी संरक्षण के काम व आक्रामक पौधों को समय-समय पर हटाने के उपाय दर्ज हैं। सौज में मौसमी मछली पकड़ने पर रोक, बारीक जालों पर पाबंदी और मवेशियों के प्रवेश का नियंत्रण प्रस्तावित उपाय हैं। इन्हें लागू हो चुकी नई पाबंदी नहीं माना जा सकता। पक्षी पर्यटन के दूसरे विकल्प पर Dalimss News की सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान की जानकारी भी उपलब्ध है।
पर्यटकों के लिए पहले से तय नियम
सुखना जाने वाले लोगों के लिए चंडीगढ़ प्रशासन की 2020 की अधिसूचना में ठोस हिदायतें हैं। झील में मछलियों और प्रवासी पक्षियों को खाना खिलाना प्रतिबंधित है। लोगों के आक्रामक प्रजातियां छोड़ने, प्लास्टिक कैरी बैग इस्तेमाल करने और ठोस कचरा डालने पर भी रोक है। बिना उपचार वाला गंदा पानी छोड़ना तथा झील को भरना निषिद्ध गतिविधियों में शामिल हैं। ये प्रावधान नए रामसर ऐलान के साथ पहली बार नहीं आए हैं। अधिसूचना 19 जून 2020 के राजपत्र में प्रकाशित हुई थी और उसने सुखना के 493 एकड़ क्षेत्र को आर्द्रभूमि घोषित किया था।
उसी अधिसूचना में इको-टूरिज्म को विनियमित गतिविधि रखा गया है। निर्धारित जगहों पर मछली पकड़ने के लिए मत्स्य विभाग का वैध लाइसेंस चाहिए। जल निकासी, प्रवाह मोड़ने और अन्य जल-संबंधी हस्तक्षेप भी नियमन के दायरे में हैं। अधिसूचना के प्रवर्तन की निगरानी चंडीगढ़ आर्द्रभूमि प्राधिकरण और पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी गई है। देश के आर्द्रभूमि दिशानिर्देश भी हर जगह पर्यटन को स्वतः उपयुक्त नहीं मानते। किसी गतिविधि की अनुमति या उसका नियमन तय करते समय उस स्थल की पारिस्थितिक स्थिति देखनी होती है।
स्थानीय लोगों के उपयोग और आजीविका का सवाल भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। मंत्रालय के 2020 के दिशानिर्देश पहले से मौजूद अधिकारों और परंपरागत उपयोग को दर्ज करने तथा उनका आर्द्रभूमि की सेहत से तालमेल परखने को कहते हैं। राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के प्राधिकरणों के लिए जनता की शिकायत सुनकर आगे भेजने वाली समिति का प्रावधान भी बताया गया है। ऐसे में किसी नई रोक, उपयोग की अनुमति या प्रबंधन काम को समझने के लिए संबंधित स्थल की अधिसूचना और योजना देखनी होगी। केवल रामसर संख्या बढ़ना इन सभी फैसलों का विवरण नहीं देता। आर्द्रभूमि की प्रशासनिक पहचान पर Dalimss News ने वाराणसी में अधिसूचना प्रक्रिया की खबर भी प्रकाशित की है।








