छोटे और मझोले कारखानों को बढ़ने के लिए अब तक ज्यादातर बैंक कर्ज का ही सहारा रहा है। केंद्र सरकार ने इसमें एक नया रास्ता जोड़ने का फैसला किया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 6 अक्टूबर को एसएमई ग्रोथ फंड के लिए 10,000 करोड़ रुपये की प्रतिबद्धता को मंजूरी दी। यह फंड लघु और मध्यम उद्यमों में सीधे इक्विटी यानी हिस्सेदारी के रूप में पैसा लगाएगा।

कर्ज और इक्विटी का फर्क यहां समझना जरूरी है। कर्ज पर हर महीने किस्त और ब्याज चुकाना पड़ता है, चाहे कारोबार बढ़े या नहीं। इक्विटी में निवेशक कंपनी में हिस्सा लेता है और उसका फायदा कंपनी के बढ़ने से जुड़ा होता है। सरकार इसे लंबी अवधि की ग्रोथ पूंजी बता रही है, जो उन उद्यमों के लिए है जिनका कारोबार चल निकला है और जो अब बड़े स्तर पर जाना चाहते हैं।

मंत्रिमंडल की विज्ञप्ति में सरकार ने खुद माना है कि अभी जो फंड इक्विटी देते हैं, उनमें से ज्यादातर शुरुआती दौर के कारोबार और सूक्ष्म उद्यमों पर ध्यान देते हैं। लघु और मध्यम उद्यमों के लिए ग्रोथ इक्विटी की कमी बनी हुई है। यह फंड इसी कमी को भरने के लिए लाया गया है। इसकी घोषणा केंद्रीय बजट 2026-27 के पैरा 28 में की गई थी।

कौन सा उद्यम लघु है और कौन मध्यम, इसके लिए अप्रैल 2025 से लागू पैमाना है। पत्र सूचना कार्यालय के पृष्ठभूमि नोट के मुताबिक लघु उद्यम में संयंत्र, मशीनरी या उपकरण में 25 करोड़ रुपये तक का निवेश और 100 करोड़ रुपये तक का सालाना कारोबार होता है। मध्यम उद्यम के लिए ये सीमाएं 125 करोड़ रुपये निवेश और 500 करोड़ रुपये कारोबार की हैं।

फंड एक वैकल्पिक निवेश कोष, यानी अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (एआईएफ), के रूप में काम करेगा। एआईएफ निजी तौर पर जुटाया गया ऐसा फंड होता है जो निवेशकों से पैसा लेकर तय नीति के तहत निवेश करता है। केंद्र अपनी ओर से इस एआईएफ में कुल 10,000 करोड़ रुपये की प्रतिबद्धता देगा। फंड का बड़ा हिस्सा विनिर्माण यानी मैन्युफैक्चरिंग करने वाले लघु और मध्यम उद्यमों में लगाया जाएगा।

उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के लिए एक बात खास ध्यान देने लायक है। सरकार ने कहा है कि फंड टियर-2 और टियर-3 शहरों के औद्योगिक क्लस्टरों में काम कर रहे एसएमई पर भी विचार करेगा। पैसा सिर्फ महानगरों की कंपनियों तक सीमित रखने का इरादा नहीं दिखता। सरकार का दावा है कि इससे क्षेत्रीय औद्योगिक विकास, स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला और रोजगार को बल मिलेगा।

पृष्ठभूमि नोट में देश के एमएसएमई क्षेत्र के ताजा आंकड़े भी दिए गए हैं। 6 अक्टूबर 2026 तक उद्यम और उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म पर करीब 9.78 करोड़ एमएसएमई पंजीकृत हो चुके हैं। इन्होंने करीब 43.28 करोड़ रोजगार की जानकारी दी है। कुल पंजीकरण में 37.6 प्रतिशत उद्यम महिलाओं के हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक जीडीपी में एमएसएमई का हिस्सा 31.1 प्रतिशत और निर्यात में 48.58 प्रतिशत है।

पंजीकरण का बंटवारा भी कहानी बताता है। करीब 4.08 करोड़ पंजीकरण व्यापार के, 3.77 करोड़ सेवा क्षेत्र के और 1.93 करोड़ विनिर्माण के हैं। कारखाने चलाने वाले उद्यम संख्या में सबसे कम हैं, जबकि नया फंड मुख्य रूप से उन्हीं पर केंद्रित रहेगा। सरकार का कहना है कि पैसा क्षमता बढ़ाने, नई तकनीक अपनाने, निर्यात बाजार में उतरने और अधिग्रहण जैसे कामों में लग सकेगा।

एमएसएमई के लिए कर्ज की तरफ पहले से कई योजनाएं चल रही हैं। हाल में सीजीटीएमएसई की गारंटी तीन ट्रेड्स प्लेटफॉर्म पर लागू होने की खबर इसी कड़ी की थी। औद्योगिक क्लस्टरों के लिए कुशल कामगार तैयार करने की योजना पर हमारी रिपोर्ट पीएम सेतु के एक साल और 850 आईटीआई में विस्तार से है। पृष्ठभूमि नोट में पीएमईजीपी, पीएम विश्वकर्मा, रैम्प और जेड जैसी योजनाओं का भी जिक्र है।

अभी कई सवालों के जवाब बाकी हैं। विज्ञप्ति में यह नहीं बताया गया है कि फंड का प्रबंधन कौन करेगा, सरकार ने चयन के लिए कारोबार की व्यवहार्यता और बढ़ने की क्षमता की बात तो कही है, पर चुनने की ठोस प्रक्रिया क्या होगी, एक कंपनी में अधिकतम कितना पैसा लगेगा और आवेदन की प्रक्रिया क्या होगी। ये ब्योरे एसजीएफ ढांचे के तहत एआईएफ बनने और उसके दिशानिर्देश जारी होने पर ही साफ होंगे। फिलहाल मंत्रिमंडल ने केवल सरकार की ओर से 10,000 करोड़ रुपये की प्रतिबद्धता और फंड के मोटे लक्ष्य तय किए हैं।