कैंसर के इलाज में दवा का खर्च कई परिवारों की जमा पूंजी निगल जाता है। सरकार ने अब उन कैंसर रोधी दवाओं पर भी मुनाफे की सीमा तय करने का फैसला किया है, जो अनुसूचित यानी तय अधिकतम कीमत वाली सूची में नहीं आतीं। सरकार की 8 अक्टूबर की विज्ञप्ति के मुताबिक आपूर्ति और बिक्री में जोड़ा जाने वाला मार्जिन अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी के 30 प्रतिशत तक सीमित रहेगा।
सरकार का अनुमान है कि इस कदम से दवाओं की कीमतें 70 प्रतिशत तक घट सकती हैं और मरीजों को हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होगी। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी एनपीपीए के बाजार आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया कि गैर अनुसूचित कैंसर दवाओं पर औसतन करीब 170 प्रतिशत का मार्कअप लगता है। कुछ मामलों में यह 700 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा पाया गया।
आसान शब्दों में, दवा जिस कीमत पर बिकने के लिए खरीदी जाती है और मरीज को जिस एमआरपी पर मिलती है, उनके बीच का फर्क बहुत बड़ा हो जाता है। विज्ञप्ति के अनुसार रिटेल दुकान, अस्पताल की फार्मेसी और ऑनलाइन फार्मेसी में कीमतें भी अलग हो सकती हैं। महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक के राज्य प्राधिकरणों के साथ मरीजों और नागरिक संगठनों ने भी ऊंची कीमतों पर चिंता जताई थी।
नया ढांचा किन दवाओं पर लागू होगा, यह अभी तय होना बाकी है। महानिदेशालय स्वास्थ्य सेवाएं यानी डीजीएचएस के तहत एक विशेषज्ञ समिति दवाओं की सूची को अंतिम रूप देगी। उसके बाद एनपीपीए फैसला लेगा और अधिसूचना जारी करेगा। इसलिए जब तक अधिसूचना नहीं आती, दुकानों और अस्पतालों में बिक रही दवाओं की कीमतें अपने आप नहीं बदलेंगी।
जो दवाएं अनुसूचित सूची में हैं, उन पर सरकार पहले से अधिकतम कीमत तय करती है। नई व्यवस्था उसके बाहर की दवाओं को दायरे में लाती है। विज्ञप्ति में साफ है कि यह फैसला ब्रांडेड और जेनेरिक, देश में बनी और आयातित, पेटेंट वाली और बिना पेटेंट वाली, सभी कैंसर रोधी दवाओं पर लागू होगा। यानी किसी खास कंपनी या श्रेणी के लिए छूट का रास्ता नहीं रखा गया है।
ऐसे कदम का पहला उदाहरण फरवरी 2019 में दिखा था। तब सरकार के निर्देश पर एनपीपीए ने औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश 2013 के पैरा 19 के तहत 42 चुनी हुई गैर अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापार मार्जिन की सीमा तय की थी। उससे एमआरपी 91 प्रतिशत तक घटी और 526 ब्रांडों पर सालाना 984 करोड़ रुपये की बचत दर्ज की गई। नया फैसला उसी अनुभव को बड़ा दायरा देता है।
दवा की उपलब्धता को लेकर भी एक शर्त जोड़ी गई है। गैर अनुसूचित कैंसर दवाएं बनाने वाली कंपनियों को अपना मौजूदा उत्पादन स्तर बनाए रखना होगा। विज्ञप्ति के मुताबिक इसका मकसद यह है कि दाम घटने के साथ मरीजों को जरूरी दवाएं मिलती रहें। यह शर्त कैसे लागू होगी, इसका ब्योरा अधिसूचना में ही दिखेगा।
जमीन पर मरीजों के लिए इसका मतलब अधिसूचना और दवाओं की सूची आने के बाद ही साफ होगा। विज्ञप्ति में बताया गया है कि देश में हर एक लाख आबादी पर करीब 60 लोग कैंसर से प्रभावित हैं और इलाज का खर्च अक्सर परिवार अपनी जेब से उठाते हैं। तब तक इलाज करा रहे मरीजों को अपने डॉक्टर की लिखी दवा और खुराक में कोई बदलाव अपनी तरफ से नहीं करना चाहिए।
अस्पतालों की दूरस्थ परामर्श सेवाओं का दायरा भी बढ़ रहा है। इस बारे में ई-संजीवनी पर 50 करोड़ परामर्श की खबर और स्वास्थ्य पेशेवरों के नए पंजीकरण नियम की रिपोर्ट भी पढ़ सकते हैं। फैसले की पूरी जानकारी मूल सरकारी विज्ञप्ति में उपलब्ध है।








